Tuesday, 3 April 2018

नफरत की राजनीति के शिकार मत बनो मत जलाओ अपने देश को क्या मिलेगा अपनो को मारकर ।

आपस में प्रेम करो मेरे देश प्रेमियों , ये देश अपना घर है और अपने घर को क्यों जला रहे ।
^आदर्श दुबे अनूपपुर^
दंगे ,फ़साद ,झगड़े से सिर्फ नफ़रत हाँथ आयी है । अपनो ने खोया है दूसरों ने मजा लिया , लेफ्ट नेता गिरी छोड़ दो भड़काना बंद कर दो देश को थोड़ा शर्म करो
कानून मांगने का क्या यही तरीका था
अपनो को मार के क्या मिला। क्या देश तुम्हारा नही? देश में 10 मौतें एक बच्ची शामिल । क्या वो देशवाशी नही थे?  आपसी लड़ाई में देश जलेगा, धर्म टूटेगा ,एकता खण्डित होगी। क्या यही चाहते हो ?

जिन नेताओं ने भड़का कर नियम विरुद्ध गलत तरीके से आंदोलन का ये रूप दिया , उन्हें भी कहता हूं याद रखो आज वोट के लिए जातिगत हो गये किस मुंह से मांगने जाओगे अब उनसे वोट , देश एक हो अखंड हो प्रेम हो यही नारा लगवाते हो ना माइक से तालियों की गूंज सुनने को कान तरस जाते हैं यही एकता की मिसाल दी तुमने ।
तोड़ ,फोड़, जबरदस्ती , हमला,मौत,लूट, जैसी घिनोनी हरकत करवाई वो भी अपनी ही मातृ भूमि का अपमान कर शर्म नही आई , क्या यह सरकार का फैसला था की उग्र हुये  और जानने के बाबजूद की सुप्रीम कोर्ट के सामने बात कैसे रखनी है जानबूझ के जलवाया देश को ।

पूरी कहानी केस की एट्रोसिटी एक्ट पूरा पढ़ें।
*सुप्रीम कोर्ट केस क्रमांक 416/ 2018 -  सारांश*
गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फार्मेसी कराड के एक SC ST जाति के स्टोर कीपर की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में उनके सीनियर ने विपरीत टिप्पणी दर्ज की।  स्टोर कीपर ने उनके विरुद्ध SC ST एट्रोसिटी एक्ट के तहत FIR पुलिस  में दर्ज कर दी। पुलिस ने उन अधिकारियो को गिरफ्तार करने हेतु डायरेक्टर ऑफ टेक्निकल एजुकेशन से अनुमति मांगी जिसे मंजूर नहीं की गई । इसके   करीब  5 साल बाद उक्त स्टोर कीपर ने डायरेक्टर टेक्निकल एजुकेशन के विरुध्द FIR दर्ज करवा दी। (पेज 3 ,4). डायरेक्टर ने अग्रिम जमानत हेतु न्यायालय में याचिका पेश की जिस पर केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
एट्रोसिटी एक्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के नागरिकों के विरुद्ध होने वाले कृत्यों को अपराध माना गया है I जैसे, उनका सामाजिक बहिष्कार करना, जान बूझ कर उन्हे सार्वजानिक रूप से अपमानित या प्रताड़ित करना,,  इत्यादि.
विवाद का विषय यह है कि इस एक्ट के सेक्शन 18 के अनुसार, यदि  इस एक्ट के अंतर्गत यदि किसी की विरुद्ध FIR  की जाती है तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती . इसका यह भी अर्थ निकाला गया की यदि कोई कंपलेंट करे तो उसे FIR दर्ज़ कर गिरफ्तार करना है भले ही बाद में कोर्ट में केस झूठा सिद्ध हो पर उसे पहले जेल जाना होगा।
विडम्बना ये है कि लूट, डकैती, बलात्कार , हत्या जैसे आरोपों में भी अग्रिम जमानत मिल सकती है पर  एट्रोसिटी एक्ट के तहत नहीं. (फैसले का पृष्ठ 15 एवं 24).  इस एक्ट का दुरूपयोग करते हुए  बड़ी संख्या में  केस विशेष रूप से शासकीय एवं अर्धशासकीय सेवकों के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वार्थवश  फाइल किये गए हैं। 
 नेशनल क्राइम रिकॉर्डस  ब्यूरो , मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स  के डाटा (क्राइम इन इंडिया 2016- सांख्यिकी) के अनुसार वर्ष 2016 में SC केसेस में 5347  केस  एवं  ST  के 912  केस झूठे  पाए गए. वर्ष  2015  में 15638  में से 11024 केसेस में आरोप मुक्त कर दिए गए , 495  केस वापस  ले लिए गए (पृष्ठ 30)।  वर्ष 2015 में कोर्ट द्वारा निष्पादित केस में  से  75 % से अधिक  केस में या तो आरोप सिद्ध नहीं हुये या केस वापस ले लिए गए  (पृष्ठ 33  )।
 कोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए बने इस एक्ट का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। इसे  व्यकितगत  शत्रुता के कारण बदला लेने या ब्लैकमेल करने का हथियार बनने नहीं देना चाहिए. (पृष्ट 25 ). कानून निरपराध को बचाने  एवं  दोषी  को  दंड दिलाने के लिए है. अतः  यदि प्रथम दृष्ट्या किसी ने  अपराध नहीं किया है तो सिर्फ किसी के आरोप लगा देने मात्र से सेक्शन 18 के तहत अग्रिम ज़मानत न देना उचित नहीं है।  इस तरह  स्वतंत्रता  के मूल संवैधानिक अधिकार  का हनन होगा.  यदि ऐसा नहीं हुआ तो शासकीय सेवकों  का कार्य निष्पादन कठिन होगा। सामान्य  नागरिक को भी इस एक्ट के तहत गलत केस में फंसा देने की धमकी दे कर  ब्लैक मेल किया जा सकता है। (पृष्ठ 67 ) .

अंततः कोर्ट ने कहा की एट्रोसिटी  एक्ट के केस में  अग्रिम ज़मानत देने पर कोई रोक नहीं है अगर प्रथम दृष्टया केस दुर्भावनावश फ़ाइल किया गया हो।  निरपराध नागरिकों को गलत आरोपों के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए डी एस पी द्वारा समयबद्ध प्राथमिक जांच की जानी चाहिए एवं केस रजिस्टर होने के बाद भी गिरफ़्तारी आवश्यक नहीं है। इस एक्ट के हो रहे दुरूपयोग के मद्देनज़र   शासकीय सेवकों को बिना नियुक्तिकर्ता अधिकारी की अनुमति के  गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा।  गैर शासकीय सेवकों के केस में  जिले  की वरिष्ठ पुलिस सुपरिंटेंडेंट की अनुमति आवश्यक होगी. (पृष्ठ 86 87)।

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